
बांग्लादेश में बदलती राजनीतिक स्थिति के कारण भारत को 1971 के युद्ध के बाद से सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. इसे लेकर विदेश मामलों पर संसद की एक स्थायी समिति ने सरकार को चेताया था. समिति ने इस्लामी ताकतों के पुनरुत्थान, कमजोर होती घरेलू राजनीतिक संरचनाओं और ढाका में चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव की ओर इशारा किया है. चीन और पाकिस्तान ने शेख हसीना के 2024 में सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ाया है. खासकर मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान. पाकिस्तान ने आईएसआई के जरिए अपना गुप्त संचालन फिर शुरू किया. जबकि चीन ने बीआरआई ( बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) और आर्थिक निवेशों से रणनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश शुरू की. दरअसल यह बदलाव भारत-विरोधी ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहा है.
पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद पाकिस्तान के साथ संबंधों में आया हालिया बदलाव दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित कर रहा है. यूनुस सरकार द्वारा पाकिस्तानी कार्गो शिपमेंट पर से अनिवार्य कस्टम जांच हटाने और व्यापारिक सुविधाएं देने के निर्णय ने चिंता बढ़ा दी है. आशंका है कि इन ढील का लाभ उठाकर ISI द्वारा नशीले पदार्थों, अवैध हथियारों की तस्करी और उग्रवादी नेटवर्क को पुनर्जीवित किया जा सकता है. रक्षा विश्लेषकों के अनुसार 2024-2025 के दौरान ढाका में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (ISI) की पैठ गहरी हुई है. भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को अस्थिर करने के उद्देश्य से अलगाववादी समूहों को समर्थन देने और ‘प्रॉक्सी’ गतिविधियों को बढ़ावा देने के प्रमाण मिले हैं. जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की बढ़ती भूमिका और लश्कर-ए-तैयबा जैसे प्रतिबंधित समूहों की सक्रियता ने बांग्लादेश को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए एक संभावित ‘लॉन्चिंग पैड’ के रूप में खड़ा कर दिया है. यह स्थिति पिछले एक दशक में बने सुरक्षा तालमेल को गंभीर चुनौती दे रही है.
